शहीद ऐ आजम सरदार भगत सिंह कि जेल डायरी पृष्ठ 113
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दिवानी और फौजदारी, दोनों ही प्रकार कि कार्रवाई में, गलती की शिकायत दर्ज कि जाती है। दीवानी (कार्रवाई )में, अधिकार का दावा किया जाता है ;
#फौजदारी (कार्रवाई) में गलती का आरोप लगाया जाता है।
#दीवानी न्याय का सरोकार, प्राथमिक तौर पर, वादी और उसके अधिकारों से होता है ;
#फौजदारी_न्याय_के_उददेश्य
#सजा
यह तटस्थ 'अपराधकर्ताऔं' जैसे राजनीतिक व्यक्तियों के मामलों में उपयोगी नहीं हो सकती ।यह उनके लिए एक बुरा सौदा सिद्ध हो सकती है।
1.निवारक : कानून का प्रमुख उद्देश्य दोषी व्यक्ति को एक नजीर बनाना और उस जैसे बाकी सभी व्यक्तियों को एक चेतावनी देना है। यह प्रत्येक अपराध को 'अपराधकर्ता कि एक दुर्भावना ' सिद्ध करता है। (इरादे का बदलाव)
2.निरोधक : दूसरे मामले में, यह निरोध या आयोग सिद्ध करने वाला है। इसका विशेष उद्देश्य अपराधकर्ता को नाकाम कर उसे पुन: गलत काम करने से रोकना हैं।
#प्राणदण्ड_का_औचित्य
हम हत्यारों को फांसी महज इसीलिए नहीं देते कि यह दूसरों को (हत्या करने से) विरत करती हैं ,बल्कि उसी कारण से, जिस कारण से हम, उदाहरण के लिए, सांप को मार डालते हैं, क्योंकि हमारे लिए यही बेहतर है कि वे इस दुनिया में रहने के बजाय इससे बाहर हो जाएं।
3.सुधारात्मक : अपराध चरित्र के ऊपर इरादों के प्रभाव से किए जाते हैं, और वे या तो इरादों के बदलाव से या चरित्र बदलाव से रोके जा सकते हैं।
निवारक सजा पहले मामले में दी जाती है (कुछ शब्द अस्पष्ट -सं.)। जबकि सुधारात्मक सजा दुसरे मामले में दी जाती हैं।
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हो सकता है कि लिखते समय किसी शब्द को ,किसी शब्द सूचक को सही ढंग से नहीं लिख पाया हूं तो मै सबसे हाथ जोड़कर माफी चाहता हूं धन्यवाद आपका अपना "हरिसिंह ददरेवा अभितेजवादी""9377293519"
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