Tuesday, 29 May 2018

शहीद ऐ आजम सरदार भगत सिंह जेल डायरी पृष्ठ 101

 #शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह की जेल डायरी
 पृष्ठ संख्या 101 
समाजशास्त्र (हाशिए पर नोट किया हुआ)
 #मूल्य - एक पाव मक्का =लोहे की कीमत। यह समीकरण हमें क्या बताता है? यह हमें बताता है कि भिन्न-भिन्न चीजों में -मक्का पाव भर में और लोहे की कीमत में- समान गुणों वाली कोई चीज़ दोनों में उभयनिष्ठ रूप से मौजूद है ।अतः इन दो चीजों को अवश्य ही किसी ऐसी तीसरी चीज के बराबर होना चाहिए  जो स्वयं न तो पहली चीज हो, और न ही दूसरी चीज .....। अब आइये हम दोनों उत्पादों में से प्रत्येक के भीतर निहीत इस तीसरी अवशिष्ट चीज पर विचार करें, यह प्रत्येक उत्पाद में, एक ही अभौतिक यथार्थ के  रूप में,एकसार मानवीय श्रम,  यानी उस श्रम  शक्ति के महज एक जमाव के  रूप में निहित है,  जिसमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस श्रमशक्ति के खर्च किए जाने की विधा क्या रही है। जब हम इस सामाजिक पदार्थ यानी श्रम को उसके अलग-अलग स्पष्ट मूर्तमान रूप में देखते हैं , तो सर्वसाधारण के लिए, वे मूल्य कहलते हैं ।- मार्क्स, पूंजी,  अंग्रेजी अनुवाद( पृष्ठ 3, 4, 5)

#कानून(मूल में शीर्षक की बायीं तरफ सी(‹/)सही का निशान।
 बहरहाल , समाज कानून पर आधारित नहीं होता है । यह तो एक कानूनी गल्प है।इसके विपरीत, कानून को अवश्य ही समाज पर आधारित होना चाहिए। इसे निश्चय ही समाज के हित और आवश्यकताओं कि अभिव्यक्ति होना चाहिए, और इसे औधोगिक उत्पादन -प्रणाली से नि:सृत होना चाहिए। इस समय मेरे हाथ में नेपोलियन संहिता है, लेकिन इसने आधुनिक नागरिक समाज को नहीं पैदा किया है। 18 वीं सदी में जन्मा और 19वीं सदी में विकसित हुआ समाज इस संहिता में सिर्फ एक कानूनी अभिव्यक्ति के रूप में निहित है। जब यह सामाजिक दशाओं के अनुरुप नहीं रह जाएगा , तब यह महज रद्दी कागज का पुलिन्दा ही सिद्ध होगा.... । जीवन की बदलती दशाओं के साथ साथ कानून भी निश्चित तौर पर बदलते रहें हैं। परंतु सामाजिक..... विकास कि नई आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को दरकिनार कर (युग कि पुकार के लिहाज से )पुराने कानून को बनाऐं रखना, दर अशल सर्वसाधारण के हित के विपरीत किन्ही खास हितों की पाखंडपूर्ण हिमायत के अलावा और कुछ नहीं है। 
- मार्क्स(कोलोन की जूरी अदालत में )

#जनसमुदाय  जनता एक ऐसे भारी भरकम और पंचमेल जानवर की भांति होती है, जो अपनी ही ताकत से अनभिज्ञ रहता है और इसलिए बोझ ढोते हुए कोड़े -डंडे खाता रहता है।  यह उस फितने बच्चे द्वारा भी हांक लिया जाता है, जिसे वह जब चाहे धक्के मारकर फेंक सकता है। लेकिन यह उस बच्चे से डरता है और इसलिए यह उसकी सारी सनको और मनबहकियों को झेलता रहता है और कभी महसूस नहीं करता कि वह बच्चा खुद उससे डरता है..... ।अदभुत है! लोग खुद अपने ही हाथों से  अपने आपको फांसी दे देते हैं और खुद ही जेल चले जाते है तथा खुद ही अपने उपर युद्ध और मौत का कसर बरपा लेते हैं। किसलिए? बस एक दमड़ी के लिए। जबकि धरती और आकाश के बीच जो कुछ है सब तो उनका ही है, लेकिन वे इसे नहीं जानते और अगर उन्हें कोई यह बता दे तो वे उस आदमी को  गिराकर मार डालेंगें । ( तोम्मासो कैम्पानेला : इतालवी कवी और दार्शनिक। 

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हो सकता है कि लिखते समय किसी शब्द को, किसी शब्द सूचक को सही ढंग से नहीं लिख पाया हूं तो मै सबसे हाथ जोड़कर माफी चाहता हूं धन्यवाद आपका अपना #हरिसिंह_ददरेवा_अभितेजवादी
9377293519
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